रविवार, 16 मई 2021

मैं कैसे कुछ Positive Share करूँ

 मैं कैसे कुछ Positive Share करूँ
उस दौर में...
जहाँ "Positive" होना
मौत की दस्तक-सा है !
पता नहीं था दम घुटना क्या होता है
बस साँस चलती थी...
कभी गौर ही नहीं किया इसपर!
पर अब सबका दम घुट रहा है
सिस्टम का...
अस्पतालों का...
इंसानों का!
बस साँस ले रही है
तो सिर्फ सरकारें!
वोट के Oxygen पर
सत्ता का तांडव है!
तभी कोई
मरते-मरते लिख जाता है
"शायद अच्छा इलाज मिलता
तो मैं बच जाता"
ये शब्द कानों में सीसा घोलते है
मन पिघल जाता है !
ऐसे Negative दौर का सच न लिखूँ
बस आपकी Morning Good हो
इसकी care करूँ?
मैं कैसे इस दौर में
कुछ Positive Share करूँ???

*"लाश की हत्या"*

 *"लाश की हत्या"*

मैं भारत माँ की बेटी थी
मैं जीते जी मर जाती थी
जब खेतो से घर जाती थी
मैं रस्तों में डर जाती थी
वो रौबदार ऊँचे कुलीन
बातें उनकी कितनी मलिन
बस नज़रे नीची कर जाती थी
सचमुच मैं डर जाती थी
पर रीढ़ की हड्डी सीधी थी
मेरी इज्जत मेरी परिधी थी
मैं गुस्से से भर जाती थी
मैं ख़ुद से ही डर जाती थी
एक दिन जो डर था सच ही हुआ
मुझे खेतों में ही दबोच लिया
किया इज़्ज़त को तार - तार
शरीर पे ढाया अत्याचार
तोड़ा जबड़ा काटी जुबान
हर तरह से कर दिया अपमान
टूटी रीढ़ मैं तनी रही
अपनी ठसक में बनी रही
लड़ी मौत से बार - बार
बस सुन ले कोई मेरी पुकार
एसपी,कलेक्टर,थानेदार
कोई योगी या चौकीदार
पर कोई न आया आगे तब
टूटने लगे साँसों के तार
फिर भी नहीं मानी मैंने हार
मुझे पता नहीं था रेप शब्द
पूछा पुलिस नें रही निःशब्द
बोले मजिस्ट्रेट कुछ गलत हुआ
मैंने हाँ में जवाब दिया
कुछ आस जगी मिलेगा इंसाफ
होंगे नहीं अब दोषी माफ़
इस आस पर दुनिया से ली विदा
अब तो गंदगी होंगी साफ
मैं चढ़ गयी बली हवस की तो क्या
न्याय के रक्षक लड़ लेंगे
मेरी बंद होती आँखों की
आख़िरी हसरत पढ़ लेंगे
भारत ये लोकतंत्र महान
न्यायतंत्र इसकी पहचान
मज़लूम के हक़ का संविधान
इनके भरोसे दे दी जान !
पर देकर के जान क्या मिला
थमा ही नहीं ये सिलसिला
कहा पेनेट्रेशन हुआ नहीं
सीमेन ट्रेस भी मिला नहीं
लड़की झूठी थी शायद
रेप तो इसका हुआ नहीं
मैं जीते - जी न हुई शर्मसार
मरने पर लेकिन जो हुए प्रहार
हतप्रभ हूँ ये देखके मैं
आया कैसे
लाश की हत्या का विचार !
इतिहास रखेंगा याद सदा
लाश भी एक चिंगारी है
तुम लाश की हत्या पर चुप हो
अगली बारी तुम्हारी है
अगली बारी तुम्हारी है !!!

रविवार, 8 दिसंबर 2019

"मानवाधिकार"

कभी सुना है आपने....
लड़की की इज्जत लूट गयी
ये "इज्जत" कैसे लूट ली जाती है
क्या इज्जत सिर्फ दो अंगों में समाती है
क्यों ऐसी घटनाओं के बाद
लड़की झुककर चलें
क्यों नाम और चेहरा छुपाना पड़े
क्यों माँ -बाप उसके शर्मिंदा हो
क्यों सालों साल न्याय का धंधा हो


इज्जत वो गवाते है जो
बलात्कार करते है
शर्म से सर तो उनका झुकना चाहिये
जो रेपिस्टों का केस स्वीकार करते है
वो न्याय व्यवस्था अपनी
करनी पे शर्मिंदा हो
जो तारीखों के फेर में
उलझती रहती है
"बेल" देती हैं अदालतें
और "बेटियाँ" सहती है
क्या मानवाधिकार सिर्फ
अपराधियों का होता है
जब जलती है बेटियाँ
तब क्या ये सोता है

न्यायलय को अपनी लाचारी पे
शर्म आनी चाहिये
समाज को दोगलेपन से
निज़ात पानी चाहिये
संसद से रेपिस्टों का
सफाया होना चाहिये
बलत्कारियों को सरेआम
धोना चाहिये
संविधान को ये दीमक बनकर
खा रहे हैं
कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे है
और तब भी तुम्हे अपराधियों के
मानवाधिकार दिखते है
जो जल गयी उस बेटी के
चिथड़े नहीं दिखते है
अरे दोगले लोगों
सच का पक्ष लेना सीखो
कलम के सिपाही हो तो
सच ही लिक्खो

वर्ना किसी दिन बेटियों की
ये चीत्कारें
तुम्हारी चौखट तक आ जाएंगी
और ये जो पहना है
मानवाधिकार का मुखौटा तुमनें
उसे नोच-नोच कर खा जाएंगी
उसे नोच-नोच कर खा जाएंगी




बुधवार, 11 अप्रैल 2018

आस्था के ताबूत में आखिरी किल

पहले तो होते थे सुनसान सड़क पर...
जंगल या बिहड़ में...
कुछ घिनौने अपराध !!!
तब भी  सोचता था मैं कि
अगर ईश्वर है तो ये सब क्यों???
यदि वो सर्वशक्तिमान,सर्वव्यापी है तो
क्यों नहीं करता सर्वनाश पापियों का???
क्यों देखता रहता है सब घटते हुए
जो जाहिर है किसी भी तर्क से सही
नहीं ठहराया जा सकता...
और अब जब मंदिर की चौखट पर ही
बाकायदा पूजा-पाठ करके...
ईश्वर को साक्षी रखकर
किये जाते है मासूमों और
मजलूमों पर जुल्म
और अपराध ऐसे कि रूह काँप जाए
तब भी ईश्वर पत्थर में जकड़ा रहा
जाने छटपटाया भी कि नहीं????
क्या यही उस सर्वशक्तिमान की
आस्था का हासिल है ???
नहीं ...
ये ईश्वर के प्रति आस्था के
ताबूत में आखिरी किल है ...
ये ईश्वर के प्रति आस्था के
ताबूत में आखिरी किल है ...



आस्था के

रविवार, 4 मार्च 2018

"लोकतंत्र"

"लोकतंत्र"

आइये आँखें खुली रखकर
वो देखते है ,जो दिख नहीं रहा है
वो पढ़ते है, जो अख़बार लिख नहीं रहा है
समझते है भाषणों के पीछे छुपे सत्य को
सुनते है जरा अनकहे कथ्य को
टटोलते है ख़बरों के पीछे छिपे तथ्य को
वर्ना पता नहीं कब कैसे.......
हमसे हमारा "लोकतंत्र" छीन जायेंगा
फिर लकीर पीटने के सिवा
कोई और ऑप्शन नहीं रह जायेंगा
फिर लकीर पीटने के सिवा
कोई और ऑप्शन नहीं रह जायेंगा


मैं दुःख हूँ

कह दिया मौत से, जा मैं नहीं मरता
क्या करूँ मेरा तुझसे जी नहीं भरता !!!
मैं दुःख हूँ ,तूने मुझे अपनाया नहीं
वर्ना सच कहूँ,मैं तेरी आँखों झरता !!!

गुरुवार, 1 मार्च 2018

"माँ"

बड़ी शिद्दत से सोचा था, कि सब रिश्ते मिटा दूँगा
बस इक फाईल है "माँ" नाम की,जो डिलिट नहीं होती।
कितनी रिलीज हुई है जिंदगी के, परदे पे लड़कियाँ
"माँ" के बाद कोई फिल्म लेकिन हिट नहीं होती।