शनिवार, 18 अप्रैल 2026

📚 पत्रकार 📚


पत्रकारिता मर जाए...
पर...
पत्रकार मरता नहीं...
उसके अंदर तड़पता है सच...
अकुलाहट से भरा हुआ होता है मन उसका...
ढूंढ़ लाना चाहता है पाताल से दबे हुए सच को....
और....
मार देना चाहता है एक भरपूर तमाचा....
झूठ के मुँह पर....
आप सत्तधीश हो, मठाधीश हो...
धन - कुबेर या न्यायाधीश हो...
रोक नहीं पाओगे सच को...
झूठ के पाँव कहाँ होते है?
कितना ही दौड़ा लो उसको...
रेंगना झूठ की नियति है...
क्योंकि तनकर वो चलता है...
जिसकी रीढ़ की हड्डी होती है!
वो पत्रकार है...
ख़बरें साँसें है उसकी...
जो मोहताज़ नहीं किसी...
स्टूडियो या कैमरे की....
तुम सबकुछ छीन लो उससे तब भी...
वो आवाज़ बुलंद कर लेंगा...
क्योंकि...
सच तो स्वयं ध्वनि है...
झूठ की तरह प्रतिध्वनि नहीं...
जिसे जरुरत हो...
बहुत तेज़ी से चीखने की...
और... उल्टा-सीधा लिखने की...
वो...
पत्रकार है...
हो जाएगा जहाँ खड़ा...
वहीं से ख़बरें पढ़ देंगा...
तुम छीन लो चाहे सबकुछ उसका....
वो व्योम से सृष्टी गढ़ लेंगा !!!

🌼 जनता को चुनता राजा 🌼

 

वो चाहते है 
जनता को चुनना...
वो "राजा" है... 
जो समझते है...
खुद को.... 
सारे तंत्र से ऊपर...
मीडिया से...
न्यायालय से...
और लोकतंत्र से ऊपर....
इतना ही नहीं "इंसान" से...
और इंसानियत से ऊपर...
उन्हें लगता है वो "पैदा" नहीं....
"अवतरीत" हुए धरा पर...
दिव्य शक्तियों के साथ 
आए वसुंधरा पर l
लगे भी क्यों ना?
जब लगभग 'भगवान' ही की तरह...
जपी जाती हो माला उनके नाम की....
करता नहीं बात कोई....
कभी -भी किसी काम की....
सभी "भक्ति-रस" में डूबे है...
उन्हें अहसास कराने...
प्रभु आप राजा है...
आएँ है...
हमको "भक्ति-मार्ग" बतलाने l
हुए धराशायी धीरे - धीरे....
सब खम्भे लोकतंत्र के...
पहले टूटा स्तंभ "पत्रकारिता" का...
फिर थोड़ी "कार्यपालिका" झुकी...
ढह गया दूसरा खम्भा....
और... "विधायिका" भी बिक गई...
चंद रुपयों की लालच में....
"पार्टी में से पार्टी" निकली...
चुनाव आयोग के कागज़ में....
फिर चौथा खम्भा क्या करता...
उसने भी रिढ़ गँवा दी...
फिर शुरू किया खेल राजा ने...
अपनी "जनता" चुनने का...
फिर हुआ खेल "चीर काल तक"
सत्ता के सपने बुनने का...
पर भूल गया "राजा"....
मद में...
जनता "राजा" को चुनती है...
जब हो जाए "निरंकुश" राजा...
जनता किसी-की ना सुनती है...
तब होती है "क्रांति" और...
महल ढहाए जाते है...
राजाओं के "नर-मुंड" फिर...
चौराहों पे सजाए जाते है...
फिर से जगता है "लोकतंत्र"...
जन-गीत फिर गाए जाते है...
"राजा" जनता को नहीं चुनता...
"जनता" में से...
"सेवक" चुने जाते है 🌼

Important Note :  यह कविता 1789 की फ़्रांस की क्रांति और राजा लूई louis 14/16 के पतन से प्रेरित है 🙏



 

शनिवार, 28 मार्च 2026

आओ.. बातें करें... तुम्हे "जौन" का वासता


वो जो एक लड़की थी,कहती थी बार - बार 
बस नाम मेरा यूँ ही, लेती थी बार -बार 
चाहती थी बेतहाशा,मुझमें खो जाती थी 
लड़ती-झगड़ती थी, फिर सो जाती थी 
मैं ही बे-मुरव्वत खुद में ही रहता था 
कितनी झूठी - मुठी उससे बातें कहता था 
बस बर्दाश्त वो मुझको करती जाती थी 
गुस्सा लेकिन नहीं जताती थी...
उसकी बातें बेमिसाल..
उसकी सोहबत कमाल...
वो समर्पण की मूरत...
मैं मतलब का जाल !
वो भक्ति का सागर...
मैं धोखे की गागर...
वो सपना सुहाना...
मैं बस एक बहाना...
वो शहद सी मीठी...
मैं जलती अंगीठी...
वो मीरा का भजन...
मैं बेवफ़ा सजन...
कितने दुःख दिए उसको...
क्यों बात नहीं की?
एक छत के नीचे 
मुलाक़ात नहीं की.
कमाता रहा 
जोड़ा तिनका-तिनका...
पर...
कमाया हुआ काम आता नहीं 
बीत जाता है जो...
वक़्त आता नहीं...
इसलिए..
बात एक जानना है ज़रूरी...
वक़्त को यादों में...
बाँधना है ज़रूरी...
कुछ नहीं रह जाता 
बातें रह जाती है 
बीत जता है वक़्त 
यादें रह जाती है...
इसको कहता था "जौन"
कालजयी हादसा...*
दिल के बोझ को हल्का 
करने का रास्ता...
क्या हुआ जो बात नहीं कही गई....
क्या हुआ जो बात नहीं सुनी गई....
आओ अब...
दिल कि गिरहें खोले...
कुछ तुम बोलों...
कुछ हम बोलें...
और मिटा दें..
सदियों का हादसा...
आओ..
बातें करें...
तुम्हे "जौन" का वासता 
आओ..
बातें करें...
तुम्हे "जौन" का वासता 🙏

 

 

( Reference जौन का शेर :

एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई)

तेरी क़ब्र को अब मैं ,कच्चा ही रखूँगा


एक जरा सी बात पर,रोना आ गया 
मुझको याद,साथ तेरा,होना आ गया 

जाता न था कोई उस वीरान हिस्से में 
काम घर का आज वो,कोना आ गया 

इश्क़ सचमुच तार देता है जीते-जी 
जो था हासिल,उसको भी खोना आ गया 

तू नहीं,पर तुझसे ही बातें करता हूँ 
मुझको भी अब देख,जादू-टोना,आ गया 

बिन तेरे नींद मुझको आती ही नहीं थी 
अब गम के बिस्तर पर,सोना आ गया 

तेरी क़ब्र को अब मैं ,कच्चा ही रखूँगा
फूल खिलाने आ गए,दुःख बोना आ गया

रात के दावे सबके सब झूठे निकले


तुम मुझको बचपन-सी प्यारी लगती हो 
तुम तो मुझको राजकुमारी लगती हो 

मैं तो झुलसा जंगल दावानल में 
तुम बिलकुल फूलों की क्यारी लगती हो 

मन तो मेरा है कि राधा बन जाऊँ 
तुम तो मुझको रास - बिहारी लगती हो 

इस दुनिया से हारा तो क्या हारा मैं?
तुम तो हमको जीत हमारी लगती हो 

कहा किसी राजा ने गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त
पर तुम तो हमको जन्नत सारी लगती हो

पता नहीं किसने औरत को अबला लिखा 
तुम तो सौ मर्दों पर भारी लगती हो 

क्रॉप टॉप के लटके झटके फीके है 
तुम जो साड़ी में इंडियन नारी लगती हो 

रात के दावे सबके सब झूठे निकले 
मैंने देखा चाँद से प्यारी लगती हो

गुरुवार, 26 मार्च 2026

एक बच्चे की याचना



गज़ा की उजड़ी धरती से 
एक मासूम ने सीखी...
थोड़ी - अंग्रेजी...
और...
कहा तुतलाती आवाज़ में...
"Please No War"
उसके इन तीन शब्दों में था...
दर्द...युद्ध का...
माँ - बाप को खोने का...
दोस्तों से बिछड़ने का! 
पर मासूम बच्चा...
जानता कहाँ था...
जिन सत्ताधिशों के लिए...
उसने अंग्रेजी सीखी...
उनके अंदर का बच्चा तो...
मर चुका है कब का !

मंगलवार, 3 मार्च 2026

ब्लड - मून

 




जैसे ही सूरज - चाँद के बीच
'पृथ्वी' आ गई...
चाँदनी 'सुर्ख-लाल' रंग में
नहा गई...
लोगों ने कहा देखो,
'मून-ब्लड' हो गया....
लगा 'ग्रहण' और
"चाँद" सो गया...
चाँद ने कहा,
'धरती' के बाशिंदों से...
मैं तुम्हारी 'पृथ्वी' का
"आईना" हो गया...
ये 'सुर्ख लाल रंग'
कहाँ मेरा है?
तुमने ही धरती पर
'लाल रंग' खेला है...
और... कहते हो मैं
"ब्लड-मून" हो गया...
ये "ग्रहण" मुझपर नहीं...
तुमपर लगा है?
तुम्हारा "मानवतावादी"
चेहरा खो गया...
मैं तो बस पृथ्वी का
"आईना" हो गया 🌞🌎🌘

- अमित अरुण