किस्से हमारे प्यार के सब आसमानी है,
कहीं चाँद है तो कहीं परियों की कहानी है।
सांवली लड़कियों के क्या दिल नहीं होते,
ऐ चाँद, तुझे एक स्याह कहानी सुनानी है।
क्यों धड़क नहीं सकता दिल मज़दूर का,
क्या मोहब्बत सिर्फ़ घोड़े पर बैठकर आनी है?
तुम AI Generation, क्या जानो मोहब्बत,
वो बीसवीं सदी की बातें पुरानी हैं।
दूरियों की तड़प का एहसास खो गया,
Snap की streaks में कैसी रवानी है।
वो स्कूल की खिड़की से इक झलक पा जाना,
अनकहे प्यार की पहली निशानी है।
प्यार का वो लड़कपन अब कहीं खो गया,
तुम्हारे हिस्से कहाँ बचपन—सिर्फ़ जवानी है।
लम्हों में सदियाँ .......
रविवार, 20 सितंबर 2026
किस्से हमारे प्यार के...
मेरी बेटी हमेशा मेरी बेटी रहेगी..
मैं एक घर बनाऊँगा...
जहाँ होगा मेरी बिटिया का एक कमरा...
जहाँ होंगी मेज़ पर किताबें उसकी...
पन्नों पर सिमटे उसके ख़याल होंगे...
समाज पर उँगली उठाते सवाल होंगे....
होगा एक कोना उसके गहनों का...
एल्बम होगा सारे भाई-बहनों का...
उस कमरे में उसकी...
सारी यादें सँजोई जाएँगी...
शादी के बाद वो...
जब भी घर को आएगी!!
भाइयों को दी जाएगी सख़्त ताकीद...
भाभी कमरे पर हक़ नहीं जताएगी...
मेरी बेटी हमेशा मेरी बेटी रहेगी..
उसका जब मन होगा लौटकर आएगी...
हम सब अब ये कहना बंद करें....
बेटा, तेरी डोली उठेगी तो बस...
अर्थी आएगी !!
मेरी बेटी हमेशा मेरी बेटी रहेगी..
उसका जब मन होगा लौटकर आएगी !!
मैं इंतज़ार में मर जाऊँगा...
मैं इंतज़ार में मर जाऊँगा...
बीज बोऊँगा, फ़सल काटने
आसमान को तकते-तकते
पहली कोंपल के इंतज़ार में
बारिश की बूँदों के प्यार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...
कोई तो हो जिससे बतियाऊँ
अपने मन की बात बताऊँ...
ख़ुश हो जाऊँ अपनी हार में
डूबूँ इतना उसके प्यार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...
बाढ़ में अबकी गाँव बहा है
पूरा ही संसार बहा है...
भूखे बच्चे हैं क़तार में...
क्या रखा गीता के सार में?
मर जाऊँगा इंतज़ार में...
पेट काटके पूत पढ़ाया
खेत बेचके ब्याह कराया...
शहरों के उस अंधकार में...
उसकी जीत और अपनी हार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...
तिनका-तिनका बिखर गया है
भाईचारा किधर गया है?
कुछ लोगों के अहंकार में...
दब गए सब अपने ही भार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...
अब बस अपने ही अंदर हूँ...
बाहर-बाहर सब कुछ ख़त्म...
शून्य से जन्मे, शून्य ही होना...
अंदर-अंदर सब कुछ भस्म...
बातों में क्या रखा है?
बस ख़ामोशी को सुन लो...
जीवन छोटा, मौत बड़ी है...
सोचो-समझो और चुन लो...
मर कर भी जी सकते हो...
आधे-अधूरे प्यार में...
पाने में क्या रखा है...
मर जाओ इंतज़ार में... 💔
शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
कठपुतली
मै महाबलेश्वर के Eco Point पर गया...
मैंने आवाज़ लगाई...
"न्यायमूर्ति"...
प्रतिध्वनि आई...
"कठपुतली"....
जो करती है "न्यायतंत्र" का नंगा नाच...
आने नहीं देती अपने आकाओं पर
थोड़ी सी भी आँच...
"लोकतंत्र" को जो काट रही है...
धीरे-धीरे...
धीरे-धीरे संविधान के कान ऐंठके...
मनु विधान को लागू कर रही...
वहाँ बैठके...
बैठके नोटों की गर्म गड्डियों पर...
कर रही वार जनता की नर्म हड्डियों पर...
जो उठाए आवाज़ सत्ता के खिलाफ...
जज साहब उनको नहीं करते माफ़...
अब लिख दिया मैंने भी कागज़ पर साफ - साफ़....
इस दरवाज़े पर नहीं मिलता इंसाफ...
न्याय की देवी कहती है यूँ हाँफ -हाँफ...
आँखों की ये पट्टी, समता की ख़ातिर थी...
बाँध ली इन सबने...
सत्ता के पाँव चाट...
सच कहती है प्रतिध्वनि...
"कठपुतली" है...
न्याय की ये सारी ही मूर्तियाँ...
नकली है...
न्याय की ये सारी ही मूर्तियाँ...
नकली है...💔
प्यार में बस प्यार होता है
वो प्रेम करना नहीं जानते...
वें बहुत अकेले है...
इतने अकेले की उन्हें ये भी नहीं पता...
ख्याल कैसे रखा जाता है?
उन्हें दूसरे के दुःख से दुःख होता है...
ये भी नहीं पता...
उन्हें नहीं मालूम...
अपने किसी प्रिय की आँखो में आँसू....
किसी शूल से चुभते है...
क्योंकि वें बहुत अकेले है...
इतने अकेले की प्यार करना ही भूल गए....
उनकी संवेदनाएँ मिट गई...
खुद में ही सिमट गई...
लोगों की लाशों पर...
तथाकथित सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ना...
उन्हें सही लगता है...
वें हर गलत को Justify कर देते है...
अपनी ताकत से...
पर उन्हें प्यार की ताकत नहीं पता...
अभागे है, बेचारे है...
सबकुछ है...
सत्ता, दौलत, शोहरत....
पर कोई नहीं अकेले में मन हल्का करने को....
ज़माना हुआ इन्होने कोई रोमांटिक फ़िल्म नहीं देखी...
नहीं पढ़ी कोई दिल को छूने वाली कहानी....
ना ही कोई प्रेम - गीत या इश्क़ से सराबोर कोई शायरी....
बस हर वक़्त....
हिंसा,पावर,पैसा,दंगा,झगड़ा...
इतना होकर भी ये 'डरपोक' और 'हारे' हुए है...
ये एक 'मन' भी जीत न पाए,
जिससे बतियाए...
खोले गिरह अपने मन की...
और... प्रेम में डूब जाए....
इन्होंनें खुद "प्यार" नहीं किया तो...
दुनिया को भी रोक रहें है प्यार से...
इन्हें प्यार में भी जिहाद दिखता है....
ये नहीं जानते "प्यार में बस प्यार होता है"...
ये "राष्ट्रवादी" है, देश-भक्त भी?
पर "निरस" है और "अशक्त" भी...
सोचता हूँ जब...
सत्ता के शिखर से नीचे उतरेंगे....
उम्र की ढलान से नीचे खिसकेंगे..
होंगे एकाकी,बंद कमरे में...
गहरे सन्नाटे में,नितांत अकेले...
क्या तब भी इन्हें "प्यार" की अहमियत समझ नहीं आएँगी?
या यूँ ही इतनी सारी नफ़रत मन में समेटे....
ये ले लेंगे इस दुनिया से विदा?
मुझे चिंता होती है सत्ताधिशों की...
हे ईश्वर,हो जाए ये भी....
किसी लड़की पे फ़िदा 🥰
*Love You My Hard Liner Political Leader* 💓❣️❤️
शनिवार, 18 अप्रैल 2026
📚 पत्रकार 📚
पत्रकारिता मर जाए...
पर...
पत्रकार मरता नहीं...
उसके अंदर तड़पता है सच...
अकुलाहट से भरा हुआ होता है मन उसका...
ढूंढ़ लाना चाहता है पाताल से दबे हुए सच को....
और....
मार देना चाहता है एक भरपूर तमाचा....
झूठ के मुँह पर....
आप सत्तधीश हो, मठाधीश हो...
धन - कुबेर या न्यायाधीश हो...
रोक नहीं पाओगे सच को...
झूठ के पाँव कहाँ होते है?
कितना ही दौड़ा लो उसको...
रेंगना झूठ की नियति है...
क्योंकि तनकर वो चलता है...
जिसकी रीढ़ की हड्डी होती है!
वो पत्रकार है...
ख़बरें साँसें है उसकी...
जो मोहताज़ नहीं किसी...
स्टूडियो या कैमरे की....
तुम सबकुछ छीन लो उससे तब भी...
वो आवाज़ बुलंद कर लेंगा...
क्योंकि...
सच तो स्वयं ध्वनि है...
झूठ की तरह प्रतिध्वनि नहीं...
जिसे जरुरत हो...
बहुत तेज़ी से चीखने की...
और... उल्टा-सीधा लिखने की...
वो...
पत्रकार है...
हो जाएगा जहाँ खड़ा...
वहीं से ख़बरें पढ़ देंगा...
तुम छीन लो चाहे सबकुछ उसका....
वो व्योम से सृष्टी गढ़ लेंगा !!!
🌼 जनता को चुनता राजा 🌼
वो चाहते है
जनता को चुनना...
वो "राजा" है...
जो समझते है...
खुद को....
सारे तंत्र से ऊपर...
मीडिया से...
न्यायालय से...
और लोकतंत्र से ऊपर....
इतना ही नहीं "इंसान" से...
और इंसानियत से ऊपर...
उन्हें लगता है वो "पैदा" नहीं....
"अवतरीत" हुए धरा पर...
दिव्य शक्तियों के साथ
आए वसुंधरा पर l
लगे भी क्यों ना?
जब लगभग 'भगवान' ही की तरह...
जपी जाती हो माला उनके नाम की....
करता नहीं बात कोई....
कभी -भी किसी काम की....
सभी "भक्ति-रस" में डूबे है...
उन्हें अहसास कराने...
प्रभु आप राजा है...
आएँ है...
हमको "भक्ति-मार्ग" बतलाने l
हुए धराशायी धीरे - धीरे....
सब खम्भे लोकतंत्र के...
पहले टूटा स्तंभ "पत्रकारिता" का...
फिर थोड़ी "कार्यपालिका" झुकी...
ढह गया दूसरा खम्भा....
और... "विधायिका" भी बिक गई...
चंद रुपयों की लालच में....
"पार्टी में से पार्टी" निकली...
चुनाव आयोग के कागज़ में....
फिर चौथा खम्भा क्या करता...
उसने भी रिढ़ गँवा दी...
फिर शुरू किया खेल राजा ने...
अपनी "जनता" चुनने का...
फिर हुआ खेल "चीर काल तक"
सत्ता के सपने बुनने का...
पर भूल गया "राजा"....
मद में...
जनता "राजा" को चुनती है...
जब हो जाए "निरंकुश" राजा...
जनता किसी-की ना सुनती है...
तब होती है "क्रांति" और...
महल ढहाए जाते है...
राजाओं के "नर-मुंड" फिर...
चौराहों पे सजाए जाते है...
फिर से जगता है "लोकतंत्र"...
जन-गीत फिर गाए जाते है...
"राजा" जनता को नहीं चुनता...
"जनता" में से...
"सेवक" चुने जाते है 🌼
Important Note : यह कविता 1789 की फ़्रांस की क्रांति और राजा लूई louis 14/16 के पतन से प्रेरित है 🙏

