शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

कठपुतली

मै महाबलेश्वर के Eco Point पर गया...
मैंने आवाज़ लगाई...
"न्यायमूर्ति"...
प्रतिध्वनि आई...
"कठपुतली"....
जो करती है "न्यायतंत्र" का नंगा नाच...
आने नहीं देती अपने आकाओं पर 
थोड़ी सी भी आँच...
"लोकतंत्र" को जो काट रही है...
धीरे-धीरे...
धीरे-धीरे संविधान के कान ऐंठके...
मनु विधान को लागू कर रही...
वहाँ बैठके...
बैठके नोटों की गर्म गड्डियों पर...
कर रही वार जनता की नर्म हड्डियों पर...
जो उठाए आवाज़ सत्ता के खिलाफ...
जज साहब उनको नहीं करते माफ़...
अब लिख दिया मैंने भी कागज़ पर साफ - साफ़....
इस दरवाज़े पर नहीं मिलता इंसाफ...
न्याय की देवी कहती है यूँ हाँफ -हाँफ...
आँखों की ये पट्टी, समता की ख़ातिर थी...
बाँध ली इन सबने...
सत्ता के पाँव चाट...
सच कहती है प्रतिध्वनि...
"कठपुतली" है...
न्याय की ये सारी ही मूर्तियाँ...
नकली है...
न्याय की ये सारी ही मूर्तियाँ...
नकली है...💔 

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