मंगलवार, 29 सितंबर 2026

अब नहीं आऊँगा दोस्त...

पैदा हुआ था मैं जहाँ 
थी भुखमरी ...
जीवन तबाह...
सुनता था एक 
कहावत...
मास्टरजी से...
"भरे पेट का चिंतन" 
और...
करता था चिंतन 
सारा बचपन...
कि...
"पेट भरने" पर कैसा लगता होगा?
क्या होता होगा महसूस?
अहसास होता होगा अद्भुत....
क्योंकि...
मैंने तो केवल एक 
मुहावरा अनुभव किया था फकत...
"पेट में चूहे कूदना"...
जब लगती थी भूख...
तो...
सो जाता था... पीकर पानी...
क्योंकि....
उछलने कूदने के लिए भी तो...
पेट का भरा होना है जरुरी...
हाए... मज़बूरी...
ले गई गुजरात...
सुना है...
कारखाने है वहाँ...
मुझे "कारखाने" में से सिर्फ..
"खाने" सुनाई दिया...
लगा काम करने से वहाँ...
भूख मिटती होंगी शायद...
सो चला आया मैं "गुजरात"...
दोस्तों के साथ...
पर जीवन का संघर्ष...
खत्म कहाँ होता है...
कभी दौडाती है कोई वबा...
गाँव की ओर...
कभी चलता है डंडा 
छँटनी का...
कभी भुगतना पड़ता है फल 
औरों की कथनी का...
इस बार "युद्ध" की विभीषिका को नतमस्तक...
"दो" तानाशाहों की सनक ने दी दस्तक...
चूल्हे बुझा दिए गरीब घरों के...
झुका दिए हौसले कमज़ोर परों के...
फिर से भुखमरी का आलम परदेस में....
फिर लौट चला मैं अपने देस में...
तपती धूप में...
धक्के खाते...
पुलिसवालों के डंडे खाते...
साहब लोगों की गालियाँ खाते...
घूँसे खाते...
लाते खाते...
पेट भर गया है साहब !
पेट भर गया है साहब ! 
बस इतना संदेसा पहुँचा देना...
अब नहीं आऊँगा दोस्त...
बता देना ! 
अब नहीं आऊँगा 
दोस्त...
बता देना !  
दिल टूट गया है...
अब सचमुच नहीं आऊँगा...
बता देना....
दोस्त... बता देना. 💔


https://youtube.com/shorts/8De-tUCsCJ8?si=CPdmcxZ1UkY3_EU3

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