रविवार, 20 सितंबर 2026

मैं इंतज़ार में मर जाऊँगा...

 मैं इंतज़ार में मर जाऊँगा...

बीज बोऊँगा, फ़सल काटने
आसमान को तकते-तकते
पहली कोंपल के इंतज़ार में
बारिश की बूँदों के प्यार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...

कोई तो हो जिससे बतियाऊँ
अपने मन की बात बताऊँ...
ख़ुश हो जाऊँ अपनी हार में
डूबूँ इतना उसके प्यार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...

बाढ़ में अबकी गाँव बहा है
पूरा ही संसार बहा है...
भूखे बच्चे हैं क़तार में...
क्या रखा गीता के सार में?
मर जाऊँगा इंतज़ार में...

पेट काटके पूत पढ़ाया
खेत बेचके ब्याह कराया...
शहरों के उस अंधकार में...
उसकी जीत और अपनी हार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...

तिनका-तिनका बिखर गया है
भाईचारा किधर गया है?
कुछ लोगों के अहंकार में...
दब गए सब अपने ही भार में...
मर जाऊँगा इंतज़ार में...

अब बस अपने ही अंदर हूँ...
बाहर-बाहर सब कुछ ख़त्म...
शून्य से जन्मे, शून्य ही होना...
अंदर-अंदर सब कुछ भस्म...

बातों में क्या रखा है?
बस ख़ामोशी को सुन लो...
जीवन छोटा, मौत बड़ी है...
सोचो-समझो और चुन लो...

मर कर भी जी सकते हो...
आधे-अधूरे प्यार में...
पाने में क्या रखा है...
मर जाओ इंतज़ार में... 💔

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