शनिवार, 18 अप्रैल 2026

📚 पत्रकार 📚


पत्रकारिता मर जाए...
पर...
पत्रकार मरता नहीं...
उसके अंदर तड़पता है सच...
अकुलाहट से भरा हुआ होता है मन उसका...
ढूंढ़ लाना चाहता है पाताल से दबे हुए सच को....
और....
मार देना चाहता है एक भरपूर तमाचा....
झूठ के मुँह पर....
आप सत्तधीश हो, मठाधीश हो...
धन - कुबेर या न्यायाधीश हो...
रोक नहीं पाओगे सच को...
झूठ के पाँव कहाँ होते है?
कितना ही दौड़ा लो उसको...
रेंगना झूठ की नियति है...
क्योंकि तनकर वो चलता है...
जिसकी रीढ़ की हड्डी होती है!
वो पत्रकार है...
ख़बरें साँसें है उसकी...
जो मोहताज़ नहीं किसी...
स्टूडियो या कैमरे की....
तुम सबकुछ छीन लो उससे तब भी...
वो आवाज़ बुलंद कर लेंगा...
क्योंकि...
सच तो स्वयं ध्वनि है...
झूठ की तरह प्रतिध्वनि नहीं...
जिसे जरुरत हो...
बहुत तेज़ी से चीखने की...
और... उल्टा-सीधा लिखने की...
वो...
पत्रकार है...
हो जाएगा जहाँ खड़ा...
वहीं से ख़बरें पढ़ देंगा...
तुम छीन लो चाहे सबकुछ उसका....
वो व्योम से सृष्टी गढ़ लेंगा !!!

🌼 जनता को चुनता राजा 🌼

 

वो चाहते है 
जनता को चुनना...
वो "राजा" है... 
जो समझते है...
खुद को.... 
सारे तंत्र से ऊपर...
मीडिया से...
न्यायालय से...
और लोकतंत्र से ऊपर....
इतना ही नहीं "इंसान" से...
और इंसानियत से ऊपर...
उन्हें लगता है वो "पैदा" नहीं....
"अवतरीत" हुए धरा पर...
दिव्य शक्तियों के साथ 
आए वसुंधरा पर l
लगे भी क्यों ना?
जब लगभग 'भगवान' ही की तरह...
जपी जाती हो माला उनके नाम की....
करता नहीं बात कोई....
कभी -भी किसी काम की....
सभी "भक्ति-रस" में डूबे है...
उन्हें अहसास कराने...
प्रभु आप राजा है...
आएँ है...
हमको "भक्ति-मार्ग" बतलाने l
हुए धराशायी धीरे - धीरे....
सब खम्भे लोकतंत्र के...
पहले टूटा स्तंभ "पत्रकारिता" का...
फिर थोड़ी "कार्यपालिका" झुकी...
ढह गया दूसरा खम्भा....
और... "विधायिका" भी बिक गई...
चंद रुपयों की लालच में....
"पार्टी में से पार्टी" निकली...
चुनाव आयोग के कागज़ में....
फिर चौथा खम्भा क्या करता...
उसने भी रिढ़ गँवा दी...
फिर शुरू किया खेल राजा ने...
अपनी "जनता" चुनने का...
फिर हुआ खेल "चीर काल तक"
सत्ता के सपने बुनने का...
पर भूल गया "राजा"....
मद में...
जनता "राजा" को चुनती है...
जब हो जाए "निरंकुश" राजा...
जनता किसी-की ना सुनती है...
तब होती है "क्रांति" और...
महल ढहाए जाते है...
राजाओं के "नर-मुंड" फिर...
चौराहों पे सजाए जाते है...
फिर से जगता है "लोकतंत्र"...
जन-गीत फिर गाए जाते है...
"राजा" जनता को नहीं चुनता...
"जनता" में से...
"सेवक" चुने जाते है 🌼

Important Note :  यह कविता 1789 की फ़्रांस की क्रांति और राजा लूई louis 14/16 के पतन से प्रेरित है 🙏



 

शनिवार, 28 मार्च 2026

आओ.. बातें करें... तुम्हे "जौन" का वासता


वो जो एक लड़की थी,कहती थी बार - बार 
बस नाम मेरा यूँ ही, लेती थी बार -बार 
चाहती थी बेतहाशा,मुझमें खो जाती थी 
लड़ती-झगड़ती थी, फिर सो जाती थी 
मैं ही बे-मुरव्वत खुद में ही रहता था 
कितनी झूठी - मुठी उससे बातें कहता था 
बस बर्दाश्त वो मुझको करती जाती थी 
गुस्सा लेकिन नहीं जताती थी...
उसकी बातें बेमिसाल..
उसकी सोहबत कमाल...
वो समर्पण की मूरत...
मैं मतलब का जाल !
वो भक्ति का सागर...
मैं धोखे की गागर...
वो सपना सुहाना...
मैं बस एक बहाना...
वो शहद सी मीठी...
मैं जलती अंगीठी...
वो मीरा का भजन...
मैं बेवफ़ा सजन...
कितने दुःख दिए उसको...
क्यों बात नहीं की?
एक छत के नीचे 
मुलाक़ात नहीं की.
कमाता रहा 
जोड़ा तिनका-तिनका...
पर...
कमाया हुआ काम आता नहीं 
बीत जाता है जो...
वक़्त आता नहीं...
इसलिए..
बात एक जानना है ज़रूरी...
वक़्त को यादों में...
बाँधना है ज़रूरी...
कुछ नहीं रह जाता 
बातें रह जाती है 
बीत जता है वक़्त 
यादें रह जाती है...
इसको कहता था "जौन"
कालजयी हादसा...*
दिल के बोझ को हल्का 
करने का रास्ता...
क्या हुआ जो बात नहीं कही गई....
क्या हुआ जो बात नहीं सुनी गई....
आओ अब...
दिल कि गिरहें खोले...
कुछ तुम बोलों...
कुछ हम बोलें...
और मिटा दें..
सदियों का हादसा...
आओ..
बातें करें...
तुम्हे "जौन" का वासता 
आओ..
बातें करें...
तुम्हे "जौन" का वासता 🙏

 

 

( Reference जौन का शेर :

एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई)

तेरी क़ब्र को अब मैं ,कच्चा ही रखूँगा


एक जरा सी बात पर,रोना आ गया 
मुझको याद,साथ तेरा,होना आ गया 

जाता न था कोई उस वीरान हिस्से में 
काम घर का आज वो,कोना आ गया 

इश्क़ सचमुच तार देता है जीते-जी 
जो था हासिल,उसको भी खोना आ गया 

तू नहीं,पर तुझसे ही बातें करता हूँ 
मुझको भी अब देख,जादू-टोना,आ गया 

बिन तेरे नींद मुझको आती ही नहीं थी 
अब गम के बिस्तर पर,सोना आ गया 

तेरी क़ब्र को अब मैं ,कच्चा ही रखूँगा
फूल खिलाने आ गए,दुःख बोना आ गया

रात के दावे सबके सब झूठे निकले


तुम मुझको बचपन-सी प्यारी लगती हो 
तुम तो मुझको राजकुमारी लगती हो 

मैं तो झुलसा जंगल दावानल में 
तुम बिलकुल फूलों की क्यारी लगती हो 

मन तो मेरा है कि राधा बन जाऊँ 
तुम तो मुझको रास - बिहारी लगती हो 

इस दुनिया से हारा तो क्या हारा मैं?
तुम तो हमको जीत हमारी लगती हो 

कहा किसी राजा ने गर फिरदौस बर रूये ज़मी अस्त
पर तुम तो हमको जन्नत सारी लगती हो

पता नहीं किसने औरत को अबला लिखा 
तुम तो सौ मर्दों पर भारी लगती हो 

क्रॉप टॉप के लटके झटके फीके है 
तुम जो साड़ी में इंडियन नारी लगती हो 

रात के दावे सबके सब झूठे निकले 
मैंने देखा चाँद से प्यारी लगती हो

गुरुवार, 26 मार्च 2026

एक बच्चे की याचना



गज़ा की उजड़ी धरती से 
एक मासूम ने सीखी...
थोड़ी - अंग्रेजी...
और...
कहा तुतलाती आवाज़ में...
"Please No War"
उसके इन तीन शब्दों में था...
दर्द...युद्ध का...
माँ - बाप को खोने का...
दोस्तों से बिछड़ने का! 
पर मासूम बच्चा...
जानता कहाँ था...
जिन सत्ताधिशों के लिए...
उसने अंग्रेजी सीखी...
उनके अंदर का बच्चा तो...
मर चुका है कब का !

मंगलवार, 3 मार्च 2026

ब्लड - मून

 




जैसे ही सूरज - चाँद के बीच
'पृथ्वी' आ गई...
चाँदनी 'सुर्ख-लाल' रंग में
नहा गई...
लोगों ने कहा देखो,
'मून-ब्लड' हो गया....
लगा 'ग्रहण' और
"चाँद" सो गया...
चाँद ने कहा,
'धरती' के बाशिंदों से...
मैं तुम्हारी 'पृथ्वी' का
"आईना" हो गया...
ये 'सुर्ख लाल रंग'
कहाँ मेरा है?
तुमने ही धरती पर
'लाल रंग' खेला है...
और... कहते हो मैं
"ब्लड-मून" हो गया...
ये "ग्रहण" मुझपर नहीं...
तुमपर लगा है?
तुम्हारा "मानवतावादी"
चेहरा खो गया...
मैं तो बस पृथ्वी का
"आईना" हो गया 🌞🌎🌘

- अमित अरुण

सोमवार, 2 मार्च 2026

युद्ध

 


 

युद्ध लड़ते है दो देश?
या दो देशों के 'कुछ' लोगों का 'अहंकार'!
हाहाकार, चीख - पुकार, अत्याचार....
मरते नहीं केवल सैनिक...
पर मासूम... और... प्यार....
और....
कुछ लोग चटखारे ले लेकर देखते है....
युद्ध का लाइव टेलीकास्ट...
उन्हें 'करूण' नहीं, 'रोमांचित' करता है बम-ब्लास्ट....
और.... इंसान ही इंसान की मौत पर....
करता है अट्टाहास....
बस....
यही है 'इंसान' के 'दानव' बनने की शुरुआत?

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मातृभूमि

 अगर मैं कह दूँ अपनी "मातृभूमि" को 
कुछ ऐसा - वैसा....
खींच जाएगी तलवारें...
और... कहलाऊंगा मैं "देशद्रोही"...
कहेंगे मेरे बारे में लोग...
कैसा - कैसा???
पर बहुत सोच समझकर...
कहता हूँ....
'देश नहीं सुरक्षित "बच्चियो" के लिए....'
हर जगह गिद्ध है...
तैयार नोंचने के लिए...
और पूरी सत्ता का तंत्र है...
मासूमों को दबोचने के लिए...
न्यायलय न्याय दे रहें "अन्याय" से...
क्या हो रहा ये दो नंबर की "आय" से...
"आसाराम" से लेकर "राम - रहीम"...
बिलकिस के दोषियों से लेकर...
कुलदीप सेंगर "महामहिम"....
सबके चरणों में जज साहब लेटे है....
शायद जजों के "बेटियाँ" नहीं सब "बेटे" है...
CM / PM सब "खामोश" अन्याय पर...
या इनकी ही "मौन-मुहर" लगी इस "न्याय' पर??

💔सत्य घटना💔

- अमित अरुण

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

माँ का प्यार

 इस दुनिया में सबसे संकुचित होता है "माँ " का प्यार...
एकदम सीमित...
खुद के बच्चों तक सिमटा...
बच्चों को करता विस्मित...
ऐसी ही एक "माँ" आई थी "देवी माँ " के पास...
अपने नवजात शिशु को शीश नवाने...
"नवजात शिशु " कोमल.... अबोध.... मासूम...
सबके ऐसे ही होते है...
चाहे मानव हो या बेजुबान....
उसी मंदिर के आँगन में...
खेल रहा था नन्हा बच्चा "कुत्ते" का...
कार का लगा रिवर्स गियर...
और एक ही पल में सबकुछ ख़त्म....
बदहवास "बच्चे" की "माँ " कुछ समझ न पाई...
"चाट" रही थी बच्चे को...
सोच रही थी अभी तो खेल रहा था...
"चुप" क्यों है...
"उठा" रही थी...
"जगा" रही थी...
"मना" रही थी...
"जता" रही थी...
"निःशब्द" प्यार...
पर "कार" में बैठी "माँ" को कोई "अफ़सोस" न था....
कोई "शोक" न था...
उसकी गोद में उसका बच्चा था महफूज़ बड़ा...
दूसरी "माँ" का था सड़क पर "बेजान" पड़ा...
"ईश्वर" था मंदिर में खामोश खड़ा...
आस-पास के लोगों में से कोई न लड़ा...
सारी "माँओ" का प्यार है "सिमित"....
अपने-अपने बच्चों तक...
पता नहीं कब बात ये पहुँचे...
अकल के कच्चों तक...
"ईश्वर" मूरत में नहीं....
"भावनाओं" में है....
"प्रेम" आस्था में नहीं...
"संवेदनाओं" में है. 🐕😭🐕

रविवार, 14 दिसंबर 2025

बाबा दिल के पास ❤️

 बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई,
बाबा से ही जागी है, जो थी किस्मत सोई।
=========================
खाटू वाले बाबा, तेरी अलख जगाई है,
दुनिया छोड़ी सारी, तुमसे प्रीत रचाई है।
नतमस्तक होकर खुद को चरणों में डाला है,
बस हमने भक्ति की ये ही रीत निभाई है।
अब तो हमारी हस्ती बाबा, तुममें है खोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
=========================
दुःख सारे जीवन के हर लो, बाबा श्याम हमारे,
इस जग के हारे के बाबा, अब हो तुम ही सहारे।
राह तुम्हारी तकता हूँ, बस एक झलक दिखला दो,
कुछ तो अपने होने के हमको भी दे दो इशारे।
सिर्फ तुम्हारी आस में बाबा, आँखें हैं रोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
=========================
महाबली, महादानी बाबा श्याम हमारे हैं,
दे हारे का साथ — ये बाबा कितने प्यारे हैं।
डूब के इनकी भक्ति में भवसागर पार करो,
जितने ये है हमारे, उतने ही ये तुम्हारे हैं।
बाबा की भक्ति में हमने रूह ये भिगोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
=========================
जाति–भेद न माने बाबा, तीन–बाण–धारी,
नीला घोड़ा — टक–टक–टक–टक — शान की सवारी।
कलयुग के पापों का अब तो करने हिसाब सारा,
बाबा बनकर आए हैं,खुद बाँके–बिहारी।
हमने भी अब श्याम–नाम की धुन है पिरोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
=========================
बाबा के बाणों से तीनों लोक में हलचल है,
दुश्मन क्या कर लेगा, जब संग बाबा हरपल है।
अरे! आओ ज़माने वालों, मुझ पर कर लो ज़ुल्म–ओ–सितम,
मुझको क्या डर, जब बाबा ही मेरा संबल है।
बाबा श्याम की हस्ती हमने अंतर्मन में संजोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
बाबा से ही जागी है जो थी किस्मत सोई,
हमने भी अब श्याम–नाम की धुन है पिरोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई....
=========================
बोलो...
*युद्ध साक्षी, दुर्गा उपासक, खाटू नरेश, तीन बाण धारी, हारे के सहारे, कलयुग प्रणेता, कृष्णावतार, श्याम रूप, महादानी, महाबली,मोरवी-घटोत्कच पुत्र, बाबा बार्बरीक की जय* 🙏🙏🙏 *ll जय श्री श्याम ll* ❤️

- *भजन रचियता : अमित अरुण साहू*

रविवार, 9 नवंबर 2025

चंद्रकांत भैय्या के लिए

 मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

परिवार में रहकर,परिवार से दूर रहा
अपनी आप बीती मैंने किसी से न कही
जिसके सबसे करीब था उसी नें तोड़ा मुझे
हालातों नें भी खूब निचोड़ा मुझे
संघर्षों में मैंने जवानी है खोई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही


जीवन के संघर्षो नें पाला है मुझे
माँ के आँचल से निकाला है मुझे
इस घर की अमानत मैं उस घर का हुआ
पर मेरे दुःख को अपनों नें न छुआ 
ममता की छाँव कैसे ओझल हुई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

जैसे ही माँ छूटी हुआ थोड़ा बड़ा मैं
नाना गए अचानक,फिर सिर्फ लड़ा मैं
फिर संभला ही था कि टूट गया घर
कितना मुश्किल है जीवन का सफऱ
सोचता हूँ क्या मेरी किस्मत है सोई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

पर सच कहूँ लगता है ख़रा सोना हूँ
भट्टी में तपा पक्का खिलौना हूँ
तभी तो *रामजी* परख रहें है मुझे
दुश्मन भी देखकर थक रहें है मुझे
काट रहा हूँ जाने कौन फसल बोई
क्या सचमुच...
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही


नहीं,मुझे लगते है दुःख अब कम
दुःख हो या सुख अब रहता हूँ सम
दो हीरे दे दिए ईश्वर नें मुझे
जरुर रहें होंगे कोई अच्छे करम
मैंने अपनी पूंजी बच्चों में है संजोई
मैं एक सफऱ हूँ,क्या गम जो मंज़िल खोई
वर्धा से अयोध्या तक की कथा मैंने कही!
वर्धा से अयोध्या तक की कथा मैंने कही!

धर्म

राजनीति में धर्म होना चाहिए,
धर्म की राजनीति नहीं होनी चाहिए 
- अमित साहू

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

🌼गुलफिशा💐

 लगभग हमेशा के लिए चली गई
लड़की की
अम्मा से जब पूछा....
क्या Time Machine में बैठकर
गुज़रे लम्हों की सैर करोंगी?
चाहोगी रोकना अपनी बच्ची को
दिल की सच्ची को?
हँसते हुए बोली अम्मा...
डरती थोड़े ही हूँ...
जाने देती!!
लड़ने लड़ाई सच की...
मज़लूँमों के हक़ की!
आवाज़ उठाने...
हक़ बचाने,जाने देती...
हँसते - हँसते...
कमर
कसते - कसते !
पर जैसे ही..
पलटा रिपोर्टर...
छलक गए आँसू...
जो देख नहीं पाया कोई...
माँ छलावा कर गई!
अपनी हँसी से...
बेटी के घाव भर गई!
मैं हँसती हूँ...
तुम भी हँसना...
फूलों की पंखुड़ियों-सी...
खुशियाँ बिखेरना...
"गुलफिशा"...
ना डरना...
बेटी संघर्ष करना 👊

गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

सोमवार, 18 नवंबर 2024

बटन दबाना उसका🇮🇳

बटन दबाना उसका जिसने
*भारत आज़ाद* कराया
बटन दबाना उसका जिसने
अंग्रेज़ों को भगाया
बटन दबाना उसका जिसने
माँगी नहीं कभी माफ़ी
टेके नहीं कभी घुटने
खून से लाल करी छाती
बटन दबाना उसका जिसने
*इसरो* को बनवाया
बटन दबाना उसका जिसने
*संविधान* लिखवाया
बटन दबाना उसका जिसने
*IIT, IIM* बनाए
बटन दबाना उसका जिसने
*नवरत्न* लगवाए
बटन दबाना उसका जिसने
भारत को मज़बूत बनाया
*बटेंगे तो कटेंगे* जैसा
घटिया नारा ना लगाया
बटन दबाना उसका जिसने
भारत को एकसूत्र में बांधा
बटन दबाना उसका जिसने
*पाकिस्तान* को लाँघा
बटन दबाना उसका जिसने
बांग्लादेश आज़ाद कराया
बटन दबाना उसका जिसने
दुश्मन को झुकवाया
बटन दबाना उसका जिसने
*भींडारवाले* मरवाया
बदले में छाती को अपनी
30 गोलियों से भुनवाया
बटन दबाना उसका जिसने
*ग्लोबलइजेशन* लाया
बटन दबाना उसका जिसने
भारत को *चाँद* चुमाया
बटन दबाना उसका जिसने
*नौकरी - पेंशन* बाँटी
बटन दबाना उसका जिसने
गरीबी रेखा काटी
बटन दबाना उसका जिसने
देश में बाँटा प्यार
बटन दबाना उसका जो
कभी हुए नहीं गद्दार
बटन दबाना उसका जो
हो गए *शहीद-कुर्बान*
बटन दबाना उसका जो थे
भारत माता की शान
बटन दबाना उसका जो
मज़लूमों को गले लगाते
बटन दबाना उसका जो
*दंगे* नहीं भड़काते
बटन दबाना उसका जो
मंदिर नहीं स्कूल बनाते
बटन दबाना उसका जो
सिर्फ प्यार फैलाते
बटन दबाना उसका जो
माफ़ीवीर नहीं कहलाते
बटन दबाना उसका जो
देश के लिए मर जाते
बटन दबाना उसका जो
झोला उठाकर ना भागे
बटन दबाना उसका जो
जनता के दर्द पे जागे
बटन दबाना उसका जो
*किसान* के दर्द को समझे
बटन दबाना उसका जो
जनता की ख़ातिर तड़पे
बटन दबाना उसका जो
खोले *दुकान-ए-मोहब्बत*
बटन दबाना उसका जो
चमकाए देश की किस्मत
बटन दबाना उसका जिसमे हो
*सच* कहने की हिम्मत
बटन दबाना उसका जो
जनहित में करे *बगावत*
बटन दबाना उसका जो
ऐलान करें *हम एक है*
बटन दबाना उसका जो
बंदा दिल का *नेक* है ❤️

- अमित साहू द्वारा रचित

शुक्रवार, 15 नवंबर 2024

पापा

 मुश्किलों में जब भी पलटकर देखता हूँ
मेरे पीछे खड़े,आप नज़र आते है!

दुनिया हमदर्दी जताती है सिर्फ
"दर्द" तो बस "पापा" समझ पाते है!

आपकी तस्वीर मैं देखता नहीं
बेसबब बस आँसू छलक जाते है!

रविवार, 7 जुलाई 2024

अब तुम्हारे बाद 💔

 लग नहीं रहा है जी,अब तुम्हारे बाद
आरज़ू बची नही,अब तुम्हारे बाद

एक तुम और फासला मिटने से रहा
सब गलत न कुछ सही,अब तुम्हारे बाद

बहुत सी थी बातें जो कहनी थी मुझे तुमसे
खुद से ही मैंने सब कही,अब तुम्हारे बाद

मुस्कुराहट छोड़कर तुम तो चली गई
बारात आंसूओं की रही,अब तुम्हारे बाद

दास्तानें दर्द की हज़ारों दिलों में थी
पर कागज़ो पे ये बही,अब तुम्हारे बाद

मुश्किल था तुम्हें समझना,अब भी नामुमकिन
पहेली-पहेली ही रही,अब तुम्हारे बाद

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

आखिरी उम्मीद !!!

तुम भी न समझ सके मुझको
तुम आखिरी उम्मीद थे मेरी...
समझते हो आखिरी उम्मीद...
वही जिसके टूटने के बाद कुछ नहीं बचता
सब कुछ लगता है खत्म-सा
वैसे ही जैसे किसी अंजान शहर की
गुमनाम सड़क पर
घुप्प अंधेरा हो
और Dead End आ जाए
कुछ समझ नहीं आता है
दिल बैठा जाता है
आँखों में आँसू नहीं होते
होती है सिर्फ निराशा
ना-उम्मीदी,बेचैनी,दर्द,डिप्रेशन!
और...काट खानेवाला अकेलापन...
ये सब होता है...
आखिरी उम्मीद के खो जाने से
किसी के न समझ पाने से....
इसलिए अगर
बन सको तो किसी की आखिरी
उम्मीद बनो...
उसे पूरा करने की जिद बनो !
आखिरी वक़्त में दगा नहीं देते
किसी का दामन छोड़कर सज़ा नहीं देते...
उम्मीद की किरण को बुझा नहीं देते
जो नाउम्मीद हो उसे पीठ दिखा नहीं देते...
जो बैठा हो आपकी आस लगाए
उस शख्स को रुला नहीं देते !!
इसलिए जब किसी की आखिरी उम्मीद बनो
तो उसके लिए चट्टान-सा तनो...
मिट्टी-सा छनो...
दो उसे जीवन नया...
जिसने की हो तुमसे आखिरी उम्मीद...
क्योंकि आखिरी उम्मीद
इंसान से नहीं खुदा से की जाती है !
आखिरी उम्मीद
इंसान को खुदा बनाती है !!
आखिरी उम्मीद
इंसान को खुदा बनाती है !!
 

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2024

बेहिचक

रिश्ता ऐसा चाहिए
जिसमें कोई हिचक न हो...
कोई कसक न हो...
कोई ठसक न हो....
बस हो पानी-सा
निर्मल बहाव...
हो धूप-सा
चंचल स्वभाव....
हो फूलों-सी ताज़गी
न हो कोई नाराज़गी !
कोई भी ताम-झाम न हो
रिश्तों में हो बस सादगी !
कह दूँ तुमसे सब बेहिचक
करुँ बातें सारी बेसबब
बातों का ओर न छोर हो
झगड़ा जो हो घनघोर हो...
फिर बेहिचक हो जाए एक
जैसे झगड़ा हो कोई ब्रेक!
ऐसे ही रिश्ते टिकते है
जो बेहिचक ही लिखते है
एक-दूजे को गालियाँ
और दें बात-बात पर तालियाँ !
रिश्तों से 'हिचक' निकाल दो
बस बेशुमार तुम प्यार दो....
अपनेपन का व्यवहार दो...
बस जिंदगी संवार दो !!!