वो चाहते है
जनता को चुनना...
वो "राजा" है...
जो समझते है...
खुद को....
सारे तंत्र से ऊपर...
मीडिया से...
न्यायालय से...
और लोकतंत्र से ऊपर....
इतना ही नहीं "इंसान" से...
और इंसानियत से ऊपर...
उन्हें लगता है वो "पैदा" नहीं....
"अवतरीत" हुए धरा पर...
दिव्य शक्तियों के साथ
आए वसुंधरा पर l
लगे भी क्यों ना?
जब लगभग 'भगवान' ही की तरह...
जपी जाती हो माला उनके नाम की....
करता नहीं बात कोई....
कभी -भी किसी काम की....
सभी "भक्ति-रस" में डूबे है...
उन्हें अहसास कराने...
प्रभु आप राजा है...
आएँ है...
हमको "भक्ति-मार्ग" बतलाने l
हुए धराशायी धीरे - धीरे....
सब खम्भे लोकतंत्र के...
पहले टूटा स्तंभ "पत्रकारिता" का...
फिर थोड़ी "कार्यपालिका" झुकी...
ढह गया दूसरा खम्भा....
और... "विधायिका" भी बिक गई...
चंद रुपयों की लालच में....
"पार्टी में से पार्टी" निकली...
चुनाव आयोग के कागज़ में....
फिर चौथा खम्भा क्या करता...
उसने भी रिढ़ गँवा दी...
फिर शुरू किया खेल राजा ने...
अपनी "जनता" चुनने का...
फिर हुआ खेल "चीर काल तक"
सत्ता के सपने बुनने का...
पर भूल गया "राजा"....
मद में...
जनता "राजा" को चुनती है...
जब हो जाए "निरंकुश" राजा...
जनता किसी-की ना सुनती है...
तब होती है "क्रांति" और...
महल ढहाए जाते है...
राजाओं के "नर-मुंड" फिर...
चौराहों पे सजाए जाते है...
फिर से जगता है "लोकतंत्र"...
जन-गीत फिर गाए जाते है...
"राजा" जनता को नहीं चुनता...
"जनता" में से...
"सेवक" चुने जाते है 🌼
Important Note : यह कविता 1789 की फ़्रांस की क्रांति और राजा लूई louis 14/16 के पतन से प्रेरित है 🙏
शनिवार, 18 अप्रैल 2026
🌼 जनता को चुनता राजा 🌼
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