रविवार, 14 सितंबर 2014

ये बात और है कि , जुदा है मेरी नमाज़
अल्लाह जानता है कि काफ़िर नहीं हूँ मैं
- राजेश रेड्डी

झुकता है पाँच वक़्त , तेरे सदके में मेरा सर
बात और है के मस्ज़िद में, हाज़िर नहीं हूँ मैं
- अमित साहू
क्यों करती हैं यादें , परेशान कभी - कभी
आ भी जाओ ,कर दो ये अहसान कभी-कभी!!
बिछड़कर के तुमसे , दिल तड़पता है ऐसे
के लगता है जिस्म भी, बेजान कभी - कभी!!
तुममें यूँ खोना और खुद को भूल जाना
लगती हूँ खुद से ही, अनजान कभी -कभी !!
मुझे लोग तेरे नाम से जानने लगे है
अच्छी लगती है खोती हुई, पहचान कभी -कभी !!
चाहती हूँ मेरी आँखों से , तू न झलकें
पर छलक आते हैं , अरमान कभी -कभी !!
क्यों करती हैं यादें , परेशान कभी - कभी
अजीब लगती है ये शाम कभी -कभी !!

इस ग़ज़ल की पहली और आखिरी लाईन Ravina Sangtani की वॉल से ली गयी है !
बारिश की हर बून्द मुझे, अब लगती है ख़ास
तेरे संग ये बारिशें , शबनम - सा अहसास !!!


बारिश की बूंदें कहें , आ जमाएँ महफ़िल
मैं तो छत पर आ गया ,तू भी आकर मिल !
शीशे के टुकड़े चमकाते थे छतों पर ,
तो पा जाती थी,इशारा वो छत पर आने का !

कम्बख़्त मोबाईल ने सारा मज़ा किरकिरा कर दिया !!!
मेरे चेहरे पे गरीबी का रुबाब रहने दे ,
नहीं कर पाऊँगा समझौते अमीरी के लिए !!!
"POLA AUR DOST"

पता नहीं क्यों “पोले” पर “दोस्त” याद आते है ……
सब के सब बैल थे साले ……
एकदम वफादार……
कभी साथ नहीं छोड़ते थे
चाहे लेक्चर गोल करना हो या
कॉलेज में बम फोड़ना हो ……
किसी से झगड़ना हो
या लड़की को पकड़ना हो !!!
लुच्चे …… सारे,साथ निभाते थे
जैसे झुण्ड में चलते है बैल
वैसे ही महफ़िल सजाते थे
सब के सब बैल थे साले ……
कॉलेज टॉप करने पर मुझे बैल बुलाते थे
कितनी हिम्मत थी सालों में
हरदम साथ निभाते थे !!!
पर जीवन की आपाधापी में
कितने जहीन हो गए है ……
सारे दुनियादारी में खो गए है
सब "बैल" साले दीड-शहाणे हो गए है
अबे बैलों फुर्सत मिले तो फिर से महफ़िल जमाओ
मेरे घर के दरवाजे राह तकते है
आज पोला है मेरे बैलों , मिलने आ जाओ !!!!
और गहरा हो रहा विश्वास मेरा ……

प्रेम की नयी परिभाषाएँ गढ़ रहा हूँ
आँखों से अब मैं भी चेहरे पढ़ रहा हूँ
हर लम्हा अब हो रहा है खास मेरा
और गहरा हो रहा विश्वास मेरा ……

कोई तो है डोर , जो दिखती नहीं है
यूँ -ही तेरे गम में पलकें भीगती नहीं है
शुद्धता को छू रहा , हर अहसास मेरा
और गहरा हो रहा विश्वास मेरा ……

जो क्षणिक सुख की चाह में न जलें
जो साँसों में गूँथे और पलकों पर पलें
कोई छू रहा है सपनों का आकाश मेरा
और गहरा हो रहा विश्वास मेरा ……

राम-सीता , कृष्ण-राधा प्रतिमान बने अब
शालिनता ईश्क़ की पहचान बने अब
हो वासना-मुक्त हर मोहपाश मेरा
और गहरा हो रहा विश्वास मेरा ……