रविवार, 24 फ़रवरी 2013

जगजीत !!!!

: जगजीत !  : रचनाकार : अमित सर :



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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़ होने दो ......(II)

रचनाकार : अमित सर
तुम्हारी जुल्फों को खोलूँ .....
पढूँ  हाथों से तुम्हें .....
तुम्हारी सारी तहरीरों को ......
करूँ याद आँखों से ......
परत-दर-परत .....
तुममे समाता चलूँ .....
तुम हो जाओ समर्पित ......
मैं अपनाता चलूँ .....
थोड़ी हो जाओ तुम बर्बाद ,मुझे आबाद होने दो .....
आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़  होने दो ......

इन उँगलियों को ....

जरा-सी धडकनें दे दो .....
तुम्हे छूकर गुजरने की .....
इजाज़त ही दे - दो ......
सारी इबारतें .....
बदन की तुम्हारें .....
इन आँखों को पढ़ने की ......
नज़ाकत ही दे दो .....
आई थी जिस तरह .....
इस धरा पर तुम ......
बस वो इक झलक .....
नजरे इनायत ही दे-दो .....
लिपट जाओ बेल सी - मुझे शाख होने दो .....
आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़  होने दो ...... 

आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़ होने दो ......(I)

रचनाकार : अमित सर 


आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़  होने दो ......
ये दूरियाँ मिटने दो .....
सारे गम भीगने दो .....
आँसूओं की लड़ियों में ......
अहसास सुलगने दो ......
जस्बादों  के बहाव में ...... 
थोडा करीब आ जाओ ......
ढलकाकर दुप्पट्टे को .....
मुझपर छा - जाओ ......
इस चाँदनी रात को थोडा और शफ्फाख होने दो .....
आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़  होने दो ......

थोडा तहजीब से परे .....
झिझक किनारे करे .....
तुम मुझमें समाओं ......
मेरे गले लग जाओ ......
होंठ कंपकपातें हुए ......
अधर टकराते हुए ......
रस घोल दो मुझमें ......
प्यार उंडेल दो मुझमें .....
तुम्हारें होठों से सुलगकर मुझे अब राख होने दो ......
आज मुझे थोडा - सा गुस्ताख़  होने दो ......

शुक्रवार, 8 जून 2012

मैंने जो भी .....

:मैंने जो भी : रचनाकार :अमित सर:

मैंने जो भी सपने देखे
मेरे सपने
,तेरे सच ....

अपने बीच हुए थे मन में

तेरे - मेरे फेरे सच....


टूटे मन की झूठी बातें

उठते ही आ-घेरे सच....


मैं हूँ आधा अर्ध-सत्य सा

तेरे है सब मेरे सच ....


मेरी दुनिया थी सपनों की

तूने आके बिखेरे सच......


मैंने जो भी सपने देखे

मेरे सपने
,तेरे सच ....

चूहे खा जायेंगे ....

:FCI के चूहे : रचनाकार: अमित सर:

13  हजार टन चावल !!!
खाया है मूषक राज ने !!!
ढूँढो तो ये चूहे कैसे है ???
क्या इनके जेब में पैसे है ???
इंसानों जैसे दिखते है ...
इन्हें बाबू-अफसर कहते है...
नेताजी इनके राजा है ...
"
कृपा " से इन्हें नवाज़ा है ...
चूहों का पेट तो छोटा है....
पर राजाओं का मोटा है !!!
क्यों चूहों को बदनाम किया ???
क्या सचमुच है ये काम किया ....
मेरे गणेश के वाहन ने ???
दिल मान नहीं पाता मेरा !!!
एक चूहा पकडके लाओ ना...
मुझको तुम दिखलाओ ना ...
"
मोटा - चूहा " कैसा होता है ?
कुपोषितों को बताओ ना ....
मैं इनको वहाँ पे भेजूँगा....
वो भी छक-छक के खायेंगे ....
खूब मौज उडाएँगे !!!
कभी तो वो दिन आएँगे ....
जब FCI  के बर्बाद गोदाम ...
भूखमरी मिटाएँगे !!!
वर्ना ! हजारों टन चावल ...
यूँहीं चूहे खा जायेंगे ....
यूँहीं चूहे खा जायेंगे ....

डॉक्टर साहब !!!

:डॉक्टर साहब !!!: रचनाकार:अमित सर:

प्यारे डॉक्टर साहब !!!
आप कैसे पत्थर दिल हो गए ....

पैसों की अंधी दौड़ में ....

क्यों ऐसे खो गए
???
आप थे डॉक्टर ...

आपको बनना था भगवान...

पर आप तो नहीं बन पाए ...

ढंग के भी इंसान .

कमीशन खानेवाले....

दलाल बन गए ....

मरीजों का सौदा करके ...

मालामाल बन गए !!!

वो हर किसी को ...

सलाईन चढ़ाना ...

रूम ख़ाली न जाये ...

इसलिए मरीज रुकवाना ...

शक्कर के पानी वाला...

साईरप चलवाना ....

माँओं
  के पेट में...
बच्चियाँ
  मरवाना ...
अपने गधे बेटे को ...

घोडा बनवाना ....

डोनेशन देना
,
पैसा खिलवाना ....

और फिर....

खून चूसने के लिए ...

एक और " ड्रेकुला "
  ...
तैयार करवाना !!!

ये क्या है डॉक्टर साहब
???
आप कैसे हो गए
???
दो टके के दल्ले जैसे हो गए....

दवा-कंपनियों के....

पुच्छल्ले जैसे हो गए !!!

ये क्या है डॉक्टर साहब
???
आप कैसे हो गए
???

बचपन सारी उम्र पे भारी होता है !!!

:बचपन सारी उम्र पे भारी होता है !!!:रचनाकार:अमित सर:
जाने क्यूँ स्कूल कैद - सा लगता है !!!

पीरियड पर पीरियड ....
रेल -से चलते है ...
ऊँघती क्लासों में भी...
सपने पलते है...
जाने कब ये भारी लम्हें...
कट जाएँगे ?
कब टन-टन-टन कर...
काका बेल बजाएँगे...
कब आजाद होंगे हम....
इस जेल से ...
कब बीच की छुट्टी का...
मजा उठाएँगे !!!
रह-रह कर अहसास यही क्यूँ जगता है
जाने क्यूँ स्कूल कैद - सा लगता है !!!

काश कि सारे टीचर....
बच्चे बन जाएँ ...
न डांटें , न मारे....
अच्छे बन जाएँ ....
होमवर्क की सारी झंझट...
मिट जाए....
हँसतें - खेलते लेक्चर ....
सारे हिट जाएँ....
गुरूजी न लगे विलेन के जैसे अब....
सबके-सब रोमांटिक हीरो बन जाए ....
मैडम सारी वैम्प - वैम्प सी लगती है ...
काश के सारी....
मधुबाला-सी हो जाए....
क्यों ये मन सपनों की राह पकड़ता है
जाने क्यूँ स्कूल कैद - सा लगता है !!!

वो आख़िरी पीरियड स्कूल का....
भारी होता है....
मन तो लगता नहीं ....
फरारी होता है !!
बस स्कूल छूटने के ...
इंतजार भरे लम्हे वो !!!
तेरे घर तक - का सफ़र ...
फिर जारी होता है....
कैसे समेट लूँ ....
उन अद्भुत लम्हों को मैं .....
क्यों बचपन सारी ....
उम्र पे भारी होता है !!!
स्कूल की खट्टी - मीठी ...
यादों का....
क्यूँ दीपक रह-रहकर सुलगता है
जाने क्यूँ स्कूल कैद - सा लगता है !!!
 
या के , मैं चाहता हूँ ...
खुद को स्कूल में कैद करना ....
हो सकता है मुझको....
दुनिया से  डर लगता है....
इसीलिए तो खो जाता हूँ यादों में ....
मन बार-बार क्यूँ - यूँ मेरा तडपता है ....
जाने क्यूँ मैं कैदी बन जाता हूँ ???
जाने क्यूँ स्कूल कैद - सा लगता है ???