गुरुवार, 24 मई 2012

आमची पण एक शाळा होती........................ {हमारा भी एक स्कूल था}

:शाळा : रचनाकार: अमित सर:


तेरे जाने से - आने तक का वक़्त ....
कितना लम्बा होता है!!!
वो गलियों में तेरा इंतज़ार ...
मन में उलझन - दिल बेक़रार
हर इक मोड़ पर तू ही तू
हर परछाई से धोखा होता है ...
वो स्कूल में period off  हो जाना
तुझसे मिलने का अच्छा मौका होता है
पर ये off period बड़ी जल्दी बीत जाते है ...
ये कितने लम्बे होते है जब सर पढ़ाते  है !!!
वो आखरी बेंच पर बैठकर -तुझे ताकना
तू देख ले तो खिडकियों  से झाँकना
दोस्तों के बीच लम्बी-लम्बी हाँकना....
तेरे डाँटने को दोस्तों में हाँ बताना
दिल-ही-दिल में रोना ...
पर किसी को जताना ...
कभी - कभी  तेरा यूँ रूठ जाना ...
रास्ता बदलकर स्कूल तक आना
कभी भाई - कभी बाप को लाना .
वो क्लास टीचर से शिकायत करवाना .
सब कुछ मैं झेल गया बड़े प्यार से
बस ये सोचकर के - तू मान जायेंगी
कभी तो पिघलेंगी,मुझे जान जायेंगी
पर कितना पगला था मैं ,समझता नहीं था
जिन्दगी प्यार से नहीं , पैसों से चलती है
जाति से आदमी की हैसियत तुलती है
और,इन झमेलों के बीच
मोहब्बत झूलती है
पर जानती हो तुम -
उस स्कूल के सामने से गुजरते हुए
अब भी तुम बहुत याद आती हो ....
लगता है अब बेल बजेंगी,स्कूल छूटेंगा
और, सफ़ेद - नीली फ्रॉक में
तुम अपनी साईकिल पर
इन गलियों से गुजरोंगी
तो फिर एक बार मैं
कोशिश में लग जाऊंगा
पता नहीं..... मुझको
क्या तुमसे कह पाऊंगा???
पर अचानक ठक-से
ये सपने टूट जाते है
जब दुनिया के सच
मुझको बुलाते है
क्यों हम अपने सपनो को सुलाते है ???
दुनिया की जद्दोजहद में ....
हम खुद ही खो जाते है ....
पर सच कहूं वो स्कूल के दिन
बहुत याद आते है
वो स्कूल के दिन बहुत याद आते है.






 

शनिवार, 19 मई 2012

उजली-उजली चाँदनी से धुली हुई......

:उजली-उजली चाँदनी से धुली हुई: रचनाकार:अमित सर:
  उजली-उजली चाँदनी से धुली हुई
जिंदगी की किताब सी खुली हुई
मीठी-मीठी किसी बच्चे की जुबान सी
मेरी प्रियतमा है मिश्री में घुली हुई ।।1।।

आँखों में प्रेम की मशाल जली हुई
शब्दों में अभिव्यक्ति कुछ संभली हुई
मैं बन गया रास्ता प्यार का
मेरी प्रियतमा ईश्क की गली हुई ।।2।।

शब्द-शब्द उसका लगे गीता का स्वर
वाणी उसकी फूलों सी विनम्र; काँटों सी प्रखर
लयबद्ध महाकाव्य सुनाती हुई
मेरी प्रियतमा आई है गुनगुनाती हुई।।3।।

मेरे सवालों की अनंत श्रृंखला का
लगती है वो एकमात्र प्रतिउत्तर
मेरी उलझनों को सुलझाती हुई
मेरी प्रियतमा संग है मुझे बहलाती हुई।।4।।

जुगनुओं की बस्ती, तम में आशा की किरण
दुःख में जैसे ईश्वर का हो स्मरण
प्रतिपल करूँ मैं उसी का सुमिरन
मेरी प्रियतमा आज उत्कृष्ट याद हुई।।5।।

मंदिर में माँगी हुई मन्नत कोई
मिल जाए मुझे, दे दी हैं मैने अर्जी
लो आज फिर एक अद्भूत बात हुई
मेरी प्रियतमा सर्वोत्कृष्ट फरियाद हुई।।6।।

बंद पलकों में छिपा सपना कोई
बिन मिले ही मिला अपना कोई
बिती बातों को सुनाती-सुनती हुई
मेरी प्रियतमा यादों को चुनती हुई।।7।।

खामोशियों में भी खुद को करती बयाँ
देती रोशनी होती हो जब रात स्याह
प्यार की दासतान को बुनती हुई
मेरी प्रियतमा मेरे प्रेमपत्र सुनती हुई।।8।।

दास्ताने इश्क लिखना कहाँ आसान है.......

:दस्ताने इश्क : रचनाकार : अमित सर:

दास्ताने इश्क लिखना कहाँ आसान है
शब्दों में निचोडनी पड़ती जान है

उन्हें सिखानी पड़ती है यहाँ वफ़ा
जो प्यार की ए. बी. सी. डी. से अंजान है

इश्क पर फैशन का ऐसा चढ़ा है कलर
वेलेंटाइनडे अब प्यार की पहचान है

हमारी संस्कृति सिखाती है समर्पण हमें
राधे- श्याम भारत के इश्क की पहचान है

जात-पात को हम ठोकरों पर रखते है
इसलिए तो जोधा का अकबर महान है

इस बिस्तर का दिल धडकने लगा है .....

:बिस्तर का दिल : रचनाकार: अमित सर:

इस बिस्तर का दिल धडकने लगा है , तेरी कुछ सिलवटें इसमें बाकी है
लगता है अभी अंगड़ाई लेके खुशनुमा हो जायेंगा, तेरी कुछ करवटें इसमें बाकी है

सारा चमन उजड़ा , सूखी  कलियाँ , फूलों ने दम तोड़ दिया
तूने छुआ था वो फूल जिन्दा है, तेरी कुछ मुस्कुराहटें इसमें बाकी है

मंदिर, मस्जिद , गुरूद्वारे सब बेजान इमारते थी पत्थर की ढह गयी
मेरा दिल आबाद है अब भी , तेरी कुछ बनावटे इसमें बाकी है

आसमान की गोद हुई सूनी , कुछ बादल रूठे, कुछ छुटे
मेरे दिल में घटाएँ अब भी उठती है , तेरी कुछ लटें इनमे बाकी है

लोग कहते है , मै मर गया, सांस रुक गयी, जी थम गया
कमबख्त जानते नहीं , तू दिल में है, तेरी कुछ आहटें इसमें बाकी है


मुक्तक .....

:मुक्तक: रचनाकार: अमित सर: 



हर कदम हर पल तुझसे सामना होंगा
पता न था तुझे देखकर दिल को थामना होंगा
काश के परदे में ही रहती तू सदा जालिम
बेकाम हुए , हमसे अब कोई काम ना होंगा


आसूओं से लिखी हुई इबारतों का क्या
बिना नींव के खड़ी हुई इमारतों का क्या
बिन कहे कहा है तूने, वो सच है क्या ?
वर्ना तेरी आखों की शरारतों का क्या ?

बात इश्क की है तुमको न समझ आएँगी .....

:बात इश्क की है: रचनाकार:अमित सर:



बात इश्क की है तुमको न समझ आएँगी
मुझको जाने दो, फिर देखना यादें सताएंगी

पास रहकर के अहसास मर से गए
जुदाई मेरी, तुमको ये बातें बताएँगी

कितनी पागल हो तुम ,कितना पागल हूँ मैं
छोड़ दो दुनिया पर , वही समझाएंगी

रावण-सी दुनिया ने, जुदा कर दिया
आज राम को सीता बहुत याद आएँगी

दूरियों के चलन का है अपना मजा
खुद मैं तड़पूँगा ,तू भी तड़प जाएँगी

कैसे दिल के जले, तप के सोना बने
कह दो जिंदगी से,कितना आजमाएंगी

तेरा मेरा है जो,कोई रिश्ता नहीं
रिवायत है, ये दुनिया ऊँगली उठाएँगी





दिल की बातें दिल में रह गयी......

:कुछ भी नहीं : रचनाकार:अमित सर :

दिल की बातें दिल में रह गयी , जुबाँ पे आया कुछ भी नहीं
सोचा बहुत था, पर आई जब तुम, हमने बताया कुछ भी नहीं

कभी ये मोती, कभी ये शबनम , तुम्हारा कतरा गंगाजल नम
गम तो यहाँ भी दबे बहुत थे, हमने बहाया कुछ भी नहीं

बादल, बिजली, सूरज , चंदा, तारें, मौसम सब तुम हो
जो कुछ था सब तुमपे लुटाया, हमने बचाया कुछ भी नहीं

दुःख सब मेरे, सुख सब तेरे, हम है तेरे गम के लुटेरे
दर्द की वैसे खेती की है, तुझे भिजवाया कुछ भी नहीं

चंचल आँखें, नाजुक बातें , चाँद सा चेहरा , जुल्फें रातें
एक झलक में इतना सब कुछ, अभी दिखाया कुछ भी नहीं

बदन धूप का, खिले रूप का, फूल-सी खुशबू , अल्ला हू
सारी नेमत तेरे हिस्से , हमने पाया कुछ भी नहीं

तेरा पसीना ओस की बूंदें , आसूं तेरे गौहर हैं
हम जो हँसें तो बने गुनाह, तूने जो रुलाया कुछ भी नहीं 

पता हैं तूने पिया न पानी, चाँद जो तुझको दिखा नहीं
मैंने भी है साथ निभाया , सुबह से खाया कुछ भी नहीं

मेरी बरकत, मेरी शोहरत, सब तुझसे ही रोशन हैं
जो कुछ है सब तेरा है, मेरा कमाया कुछ भी नहीं