शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

ज्ञानप्रकाश विवेक - बारिश !



"खड़ा हूँ इस तरह ख़ामोश, इस तरह तन्हा ,
कि जैसे शहर का अंतिम मकान होता है ,
तुम्हारे वास्ते बारिश ख़ुशी की बात सही ,
हमारी छत के लिए इम्तहान होता है......!"
(ज्ञानप्रकाश विवेक)

जिंदगी तुम्हारी नज़र कर रहा हूँ !!!



जिंदगी तुम्हारी नज़र कर रहा हूँ
खुद पे ये कैसा कहर कर रहा हूँ

तुम्हें चाहता हूँ कितना टूटकर मैं
ग़ज़लों से अपनी खबर कर रहा हूँ

होकर के दूर तुमसे ,तुम्हे चाहूँगा मैं
तुम्हारी भावनाओं की कदर कर रहा हूँ

तुम तो रुक गयी,राहों में प्यार की
पर अब भी मैं ,सफ़र कर रहा हूँ

यादों को तुम्हारी हृदय में जलाकर
स्याह रातों को ,सहर कर रहा हूँ

तुम्हें शायद ये पता ही नहीं है
तुम्हारे सहारे ,गुजर कर रहा हूँ

जिंदगी तुम्हारी नज़र कर रहा हूँ
खुद पे ये कैसा कहर कर रहा हूँ

कुछ बारिशें उसके नाम!!



कुछ बारिशें उसके नाम :

तेरी कंचन काया पर , बूँदें ओस-कँवल
टिकी जो तेरी पलकों पर , बन गई गंगाजल

छाता लेकर तुम चली , हौले-हौले पाँव
कुछ भीगी और कुछ सूखी, जैसे धूप और छाँव

पानी आग लगाता है, सच होती ये बात
भीगे-भागे मौसम में , तेरा-मेरा साथ

शफ्फाक़ बदन पर बूँदें समेटें, तू खुद में सकुचाई
और ऐसे में मेरी नज़रें , तुझसे करे लड़ाई

भीगे- भागे अंग पर , बूँदें खेलें-खेल
हाय ! बारिश की बूंदों का,उन कपड़ों से मेल 

बारिश !!!



भीग-भीग कर सब झूमें , क्या चातक,क्या मोर 
बारिश जीवनदायिनी , करती भाव - विभोर

बारिश की बूंदों नेरचा अजब संसार
पेड़ हुए मदहोश और दरिया झूमा यार

सूखी हुई जो घास थी, झूम-झूम  कर गायी
खुल गयी है मधुशाला, देखो बारिश आयी

बंद पड़ा था जो छाता, उसने ली अंगड़ाई
आसमान से मेह गिरा, खूब चली पुरवाई

मिट्टी हुई जवान और सौंधी खुशबू  छाई
बादल संग हवाओं की खूब छिड़ी लड़ाई


काफिर!




ग़ालिब शराब पीने दे , मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता, जहाँ खुदा नहीं......
(मिर्ज़ा ग़ालिब)

मस्जिद खुदा का घर है , पीने की जगह नहीं
काफ़िर के घर में जा, वहाँ खुदा नहीं......
(अल्लामा इकबाल)

काफिर के दिल से आया हूँ ,मैं ये देखकर
खुदा मौजूद हैं वहाँ , उसे पता नहीं......
(अहमद फ़राज़)

काफिर किसे कहते हो, इन्सां है सब यहाँ
कण-कण में बसता है खुदा, तुम्हे पता नहीं......
(अमित साहू)

शहीद की बेवा.....

ये हवा तुम्हारी जुल्फों से
उलझती हुई ......
जब गिराती है लटों का
पर्दा चेहरे पर ......
लगता है शफ़्फ़ाख़ आसमान पर
घटाएँ - सी है .....
और उन घटाओं से झाँकता
तुम्हारा खामोश चेहरा ......
जैसे शाम का ढलता सूरज हो
विदा होते हुए ....
वो बोलती-सी तुम्हारी आँखें ...
के अब आ भी जाओ !
वो चुप-चुप से होंठ ...
वो शाम-सी उदासी
चेहरे पर तुम्हारे ......
पर फिर भी तुम कितनी
ख़ूबसूरत लगती हो !!!
माना की दुःख में हो
पर मोहब्बत लगती हो .....
और हाँ इतनी उदासी में भी
बालों में गुलाब लगाना नहीं भूली तुम ......
जानता हूँ इस आस में ....
के मैं आऊँगा!!!
पर जानती हो तुम्हारी
लटों के पीछे से झाँकते हुए
चेहरे की उदासी .....
तुम्हारी आँखों के अनकहे शब्द ....
तुम्हारे होठों की गुमसुम सी हँसी.....
सब लौट आएँगी !!!
जब तू बच्चों को अपने ,
शहीद बाप के किस्से सुनाएँगी!!
उस दिन तेरे खामोश चेहरे की
रौनक लौट आएँगी !!
अरे हँस दे के ...
अब तक कहलाती थी जवान की बीवी ....
आज से तू शहीद की बेवा कहलाएँगी !!!
आज से तू शहीद की बेवा कहलाएँगी !!!
— Akash Sahu के साथ |




फैशन क्या है !!!

 फैशन क्या है !!!
जरुरत है या बला है !
दिखावे की दुनिया है ,
ये क्या मामला है !
खुद के लिए जीते है ???
या , दुनिया के लिए ....
जाने कौन  सी राह है
क्या सिलसिला है !
ये फैशन क्या है !
मोबाइल , गाडी, बँगला
पैसों का काफिला है !
फेसबुक पर फ्रेंड बनाने
का ये सिलसिला है !
पर माँ - बाप को तो
वृद्धालय मिला है !
न्यूक्लियर फैमिली और
बच्चा पालनाघर में ....
२१ वी सदी है , अजीब फासला है !
तन ढकते थे जो कपडे ,
नुमाइश बन चुके है !
फटकर सील जाते थे
अब सिलकर फटते है !
योगा को हम भूले
ऐरोबिक्स करते है !
ये फैशन क्या है !
बदलते दौर का आईना है !
सुनते थे जगजीत सिंह को
अब हनी सिंग का रंग जमा है !
फैशन सच कहूँ तो
बदलाव की बयार है !
पर दुःख इस बात का है ,
बदलाव के इस दौर में
भारतीय सभ्यता कम है !
पर क्या करूँ यारों
परिवर्तन  ही संसार का नियम है !
परिवर्तन  ही संसार का नियम है !
यही फैशन की दास्ताँ है
यही मेरे दिल का गम है !!!