शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

मातृभूमि

 अगर मैं कह दूँ अपनी "मातृभूमि" को 
कुछ ऐसा - वैसा....
खींच जाएगी तलवारें...
और... कहलाऊंगा मैं "देशद्रोही"...
कहेंगे मेरे बारे में लोग...
कैसा - कैसा???
पर बहुत सोच समझकर...
कहता हूँ....
'देश नहीं सुरक्षित "बच्चियो" के लिए....'
हर जगह गिद्ध है...
तैयार नोंचने के लिए...
और पूरी सत्ता का तंत्र है...
मासूमों को दबोचने के लिए...
न्यायलय न्याय दे रहें "अन्याय" से...
क्या हो रहा ये दो नंबर की "आय" से...
"आसाराम" से लेकर "राम - रहीम"...
बिलकिस के दोषियों से लेकर...
कुलदीप सेंगर "महामहिम"....
सबके चरणों में जज साहब लेटे है....
शायद जजों के "बेटियाँ" नहीं सब "बेटे" है...
CM / PM सब "खामोश" अन्याय पर...
या इनकी ही "मौन-मुहर" लगी इस "न्याय' पर??

💔सत्य घटना💔

- अमित अरुण

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

माँ का प्यार

 इस दुनिया में सबसे संकुचित होता है "माँ " का प्यार...
एकदम सीमित...
खुद के बच्चों तक सिमटा...
बच्चों को करता विस्मित...
ऐसी ही एक "माँ" आई थी "देवी माँ " के पास...
अपने नवजात शिशु को शीश नवाने...
"नवजात शिशु " कोमल.... अबोध.... मासूम...
सबके ऐसे ही होते है...
चाहे मानव हो या बेजुबान....
उसी मंदिर के आँगन में...
खेल रहा था नन्हा बच्चा "कुत्ते" का...
कार का लगा रिवर्स गियर...
और एक ही पल में सबकुछ ख़त्म....
बदहवास "बच्चे" की "माँ " कुछ समझ न पाई...
"चाट" रही थी बच्चे को...
सोच रही थी अभी तो खेल रहा था...
"चुप" क्यों है...
"उठा" रही थी...
"जगा" रही थी...
"मना" रही थी...
"जता" रही थी...
"निःशब्द" प्यार...
पर "कार" में बैठी "माँ" को कोई "अफ़सोस" न था....
कोई "शोक" न था...
उसकी गोद में उसका बच्चा था महफूज़ बड़ा...
दूसरी "माँ" का था सड़क पर "बेजान" पड़ा...
"ईश्वर" था मंदिर में खामोश खड़ा...
आस-पास के लोगों में से कोई न लड़ा...
सारी "माँओ" का प्यार है "सिमित"....
अपने-अपने बच्चों तक...
पता नहीं कब बात ये पहुँचे...
अकल के कच्चों तक...
"ईश्वर" मूरत में नहीं....
"भावनाओं" में है....
"प्रेम" आस्था में नहीं...
"संवेदनाओं" में है. 🐕😭🐕

रविवार, 14 दिसंबर 2025

बाबा दिल के पास ❤️

 बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई,
बाबा से ही जागी है, जो थी किस्मत सोई।
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खाटू वाले बाबा, तेरी अलख जगाई है,
दुनिया छोड़ी सारी, तुमसे प्रीत रचाई है।
नतमस्तक होकर खुद को चरणों में डाला है,
बस हमने भक्ति की ये ही रीत निभाई है।
अब तो हमारी हस्ती बाबा, तुममें है खोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
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दुःख सारे जीवन के हर लो, बाबा श्याम हमारे,
इस जग के हारे के बाबा, अब हो तुम ही सहारे।
राह तुम्हारी तकता हूँ, बस एक झलक दिखला दो,
कुछ तो अपने होने के हमको भी दे दो इशारे।
सिर्फ तुम्हारी आस में बाबा, आँखें हैं रोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
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महाबली, महादानी बाबा श्याम हमारे हैं,
दे हारे का साथ — ये बाबा कितने प्यारे हैं।
डूब के इनकी भक्ति में भवसागर पार करो,
जितने ये है हमारे, उतने ही ये तुम्हारे हैं।
बाबा की भक्ति में हमने रूह ये भिगोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
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जाति–भेद न माने बाबा, तीन–बाण–धारी,
नीला घोड़ा — टक–टक–टक–टक — शान की सवारी।
कलयुग के पापों का अब तो करने हिसाब सारा,
बाबा बनकर आए हैं,खुद बाँके–बिहारी।
हमने भी अब श्याम–नाम की धुन है पिरोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
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बाबा के बाणों से तीनों लोक में हलचल है,
दुश्मन क्या कर लेगा, जब संग बाबा हरपल है।
अरे! आओ ज़माने वालों, मुझ पर कर लो ज़ुल्म–ओ–सितम,
मुझको क्या डर, जब बाबा ही मेरा संबल है।
बाबा श्याम की हस्ती हमने अंतर्मन में संजोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई।
बाबा से ही जागी है जो थी किस्मत सोई,
हमने भी अब श्याम–नाम की धुन है पिरोई,
बाबा दिल के पास हैं जितने, दूजा ना कोई....
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बोलो...
*युद्ध साक्षी, दुर्गा उपासक, खाटू नरेश, तीन बाण धारी, हारे के सहारे, कलयुग प्रणेता, कृष्णावतार, श्याम रूप, महादानी, महाबली,मोरवी-घटोत्कच पुत्र, बाबा बार्बरीक की जय* 🙏🙏🙏 *ll जय श्री श्याम ll* ❤️

- *भजन रचियता : अमित अरुण साहू*

रविवार, 9 नवंबर 2025

चंद्रकांत भैय्या के लिए

 मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

परिवार में रहकर,परिवार से दूर रहा
अपनी आप बीती मैंने किसी से न कही
जिसके सबसे करीब था उसी नें तोड़ा मुझे
हालातों नें भी खूब निचोड़ा मुझे
संघर्षों में मैंने जवानी है खोई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही


जीवन के संघर्षो नें पाला है मुझे
माँ के आँचल से निकाला है मुझे
इस घर की अमानत मैं उस घर का हुआ
पर मेरे दुःख को अपनों नें न छुआ 
ममता की छाँव कैसे ओझल हुई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

जैसे ही माँ छूटी हुआ थोड़ा बड़ा मैं
नाना गए अचानक,फिर सिर्फ लड़ा मैं
फिर संभला ही था कि टूट गया घर
कितना मुश्किल है जीवन का सफऱ
सोचता हूँ क्या मेरी किस्मत है सोई
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही

पर सच कहूँ लगता है ख़रा सोना हूँ
भट्टी में तपा पक्का खिलौना हूँ
तभी तो *रामजी* परख रहें है मुझे
दुश्मन भी देखकर थक रहें है मुझे
काट रहा हूँ जाने कौन फसल बोई
क्या सचमुच...
मैं एक सफऱ हूँ जिसकी मंज़िल नहीं कोई
वर्धा से अयोध्या की व्यथा मैंने सही


नहीं,मुझे लगते है दुःख अब कम
दुःख हो या सुख अब रहता हूँ सम
दो हीरे दे दिए ईश्वर नें मुझे
जरुर रहें होंगे कोई अच्छे करम
मैंने अपनी पूंजी बच्चों में है संजोई
मैं एक सफऱ हूँ,क्या गम जो मंज़िल खोई
वर्धा से अयोध्या तक की कथा मैंने कही!
वर्धा से अयोध्या तक की कथा मैंने कही!

धर्म

राजनीति में धर्म होना चाहिए,
धर्म की राजनीति नहीं होनी चाहिए 
- अमित साहू

सोमवार, 14 अप्रैल 2025

🌼गुलफिशा💐

 लगभग हमेशा के लिए चली गई
लड़की की
अम्मा से जब पूछा....
क्या Time Machine में बैठकर
गुज़रे लम्हों की सैर करोंगी?
चाहोगी रोकना अपनी बच्ची को
दिल की सच्ची को?
हँसते हुए बोली अम्मा...
डरती थोड़े ही हूँ...
जाने देती!!
लड़ने लड़ाई सच की...
मज़लूँमों के हक़ की!
आवाज़ उठाने...
हक़ बचाने,जाने देती...
हँसते - हँसते...
कमर
कसते - कसते !
पर जैसे ही..
पलटा रिपोर्टर...
छलक गए आँसू...
जो देख नहीं पाया कोई...
माँ छलावा कर गई!
अपनी हँसी से...
बेटी के घाव भर गई!
मैं हँसती हूँ...
तुम भी हँसना...
फूलों की पंखुड़ियों-सी...
खुशियाँ बिखेरना...
"गुलफिशा"...
ना डरना...
बेटी संघर्ष करना 👊